भैंसासुर के एकत्र रक्त से निकली भैंसही नदी की धारा

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आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। इटौरा-खरिहानी मार्ग पर ताड़ी बाजार से 300 मीटर पश्चिम मां परमज्योति धाम लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। किंवदंती के अनुसार धाम से तीन किमी दूर मां परमज्योति ने भैंसासुर नामक राक्षस का वध किया। राक्षस के शरीर से जो रक्त बहा उसे भैंसहा ताल कहा गया है, जो आज बड़ैला ताल के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं से निकली भैंसही नदी गाजीपुर के बहादुरगंज में तमसा नदी में जाकर मिलती है। भैंसासुर का वध करने के पश्चात एक दिव्य पुंज वहां से निकला और वर्तमान परमज्योति धाम पर विलीन हो गया। तब से यह परम ज्योति धाम के नाम से प्रसिद्ध हो गया। दुर्गा सप्तशती में भी माता का वर्णन है। मंदिर तक पहुंचने के लिए रोडवेज व निजी बसों के अलावा जीप, आटो व निजी साधन से जाया जा सकता है। वैसे तो वर्ष भर यहां श्रद्धालुओं का रेला रहता है, लेकिन नवरात्र में सुबह से शाम तक भक्तों की भारी भीड़ रहती है। आज मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। देश के कोने- कोने में रहने वाले लोग मां परमज्योति का दर्शन करना नहीं भूलते। लोगों को विश्वास है कि माता उनकी हर मनोकामना पूर्ण करती हैं। जमीन से 10 फीट की ऊंचाई पर मां परमज्योति का दरबार सुशोभित है। लगभग 300 वर्ष पूर्व यहां नीम के पेड़ के नीचे एक छोटे से चबूतरे पर कुछ पिंडी हुआ करती थी। अगल-बगल नरकट के झुरमुट व झाड़ी थी। 31 जुलाई 1997 को मंदिर का शिलान्यास हुआ। मां परमज्योति जनकल्याण समिति की तरफ से मंदिर के चारों तरफ निर्माण पूर्ण होने के बाद 1999 में जब गर्भगृह की खोदाई हुई तो अष्टधातु की मूर्ति मिली, जो वर्तमान में परमज्योति के रूप में स्थापित है।

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आजमगढ़। -रामबदन पांडेय पुजारी ने बताया कि सच्चे मन से जो कोई यहां अपनी मुराद लेकर आता है, उसके जीवन में परमज्योति मां ज्योति बिखेर देती हैं। मुराद पूरी होने के बाद आए दिन श्रद्धालु गाजे-बाजे के साथ मां के दरबार में आते हैं। भाद्र पक्ष व खरमास को छोडक़र वर्ष भर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। क्षेत्रीय लोग वर्ष में एक बार अवश्य परिवार के साथ कड़ाही चढ़ाने आते हैं। अपने बच्चों का पहला मुंडन संस्कार यहां करवाते हैं।

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आजमगढ़। आलोक बरनवाल, साधक ने बताया कि मां की आराधना के साथ भक्तों की सेवा से भी बहुत शांति मिलती है। पिता रामानंद बरनवाल की मृत्यु के बाद नवरात्र में अन्य सहयोगियों के साथ व्यवस्था में लगा रहता हूं। स्वयं प्रतिदिन मंदिर को खोलवाकर सुबह चार बजे माता का श्रृंगार करता हूं। इससे मुझे बहुत ही संतुष्टि मिलती है। नवरात्र के दिनों में मां परमज्योति का दरबार विशेष रूप से सजाया जाता है। पूरे दिन भजन-कीर्तन चलता रहता है। प्रत्येक सप्ताह के रविवार और मंगलवार को यहां मेला लगता है।
रिपोर्ट-प्रमोद यादव/ज्ञानेन्द्र कुमार

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