किसी और को जमाने से पहले हमें स्वयं जागना होगा-पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ

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आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। “हमें किसी और को जगाने से पहले स्वयं जागना होगा, अपने भारत, अपनी सभ्यता और अपनी ज्ञान परंपरा के लिए।” वरिष्ठ पत्रकार एवं मुख्य वक्ता पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के इस आह्वान के साथ शनिवार को हरिऔध कला भवन राष्ट्रचेतना और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के विमर्श का केंद्र बन गया।
महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के तत्वावधान में रांगेय राघव शोधपीठ की ओर से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘जाग उठ मेरे हिंदुस्तान’ के मुख्य सार्वजनिक सत्र में भारतीय सभ्यता, सांस्कृतिक चेतना, साहित्य और युवा शक्ति की भूमिका पर वक्ताओं ने विचार रखे।
मुख्य वक्ता पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने कहा कि भारत को केवल 15 अगस्त 1947 से अस्तित्व में आई राजनीतिक इकाई के रूप में देखना उसकी हजारों वर्षों की सभ्यतागत निरंतरता को सीमित करना है। भारत की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा, ज्ञान-दृष्टि और जीवन-मूल्य रहे हैं। उन्होंने युवाओं से अपनी जड़ों, इतिहास और महापुरुषों को केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा न मानकर उनके विचारों और योगदान को समझने तथा वर्तमान जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता किसी दूसरे व्यक्ति या समाज को जगाने से पहले स्वयं के भीतर राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक जिम्मेदारी जगाने की है। जातिगत विभाजन से ऊपर उठकर कर्म, योग्यता और सामाजिक एकता को महत्व दिया जाना चाहिए। डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महापुरुषों को उनकी जातिगत पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि उनके विचारों और राष्ट्र व समाज के लिए किए गए योगदान के आधार पर समझा जाना चाहिए।
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रांगेय राघव के साहित्य में राष्ट्रजागरण की चेतना
आजमगढ़। संगोष्ठी में रांगेय राघव के साहित्य और उनकी राष्ट्रचेतना पर विशेष चर्चा हुई। शोधपीठ के प्रभारी प्रो. सुजीत कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि रांगेय राघव असाधारण प्रतिभा के साहित्यकार थे। उन्होंने 150 से अधिक पुस्तकों की रचना कर साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से समाज, संस्कृति और राष्ट्र से जुड़े प्रश्नों को स्वर दिया। ‘जाग उठ मेरे हिंदुस्तान’ जैसी रचनाओं में उनकी जागरण चेतना स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि रांगेय राघव ने साहित्यिक गुटबंदी से दूरी बनाए रखते हुए स्वतंत्र चिंतन को प्राथमिकता दी। भारतीय परंपरा और नाथपंथ से जुड़े साहित्य पर भी उनका महत्वपूर्ण लेखन रहा। उनका साहित्य आज भी नई पीढ़ी को सामाजिक सरोकार, आत्मचिंतन और राष्ट्रबोध की प्रेरणा देता है।
रिपोर्ट-सुबास लाल/ज्ञानेन्द्र कुमार

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