ओडीएफ घोषित ग्राम पंचायतों की जमीनी हकीकत उजागर

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अतरौलिया आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। स्वच्छ भारत मिशन के तहत जिले की 1810 ग्राम पंचायतों को ओडीएफ घोषित किया जा चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है। जिले की करीब 50 प्रतिशत ग्राम पंचायतों में सार्वजनिक शौचालय या तो बंद पड़े हैं या बदहाल स्थिति में हैं। हैरानी की बात यह है कि इन शौचालयों के रखरखाव के नाम पर हर महीने 9 हजार रुपये का भुगतान किया जा रहा है।
अतरौलिया विकासखंड के तेजापुर, सिकंदरपुर, खालिसपुर गांव स्थित सामुदायिक शौचालय एवं स्नान घर की पड़ताल में, हालात बेहद चिंताजनक मिले। शौचालय परिसर में चारों ओर गंदगी का अंबार लगा है और घास उगी हुई है। वर्ष 2020-21 में लाखों रुपये की लागत से बने इस शौचालय का उपयोग लगभग न के बराबर है।
महिला शौचालय में लंबे समय से ताला लटका हुआ है, जबकि पुरुष शौचालय का ताला तो खुला मिला, लेकिन अंदर गंदगी भरी पड़ी थी। सभी दरवाजे टूटे हुए हैं, सीटें (कमोड) जाम और क्षतिग्रस्त हैं। पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। शौचालय में लगा समरसेबल तक खराब पड़ा है और ऊपर लगी पानी की टंकी भी क्षतिग्रस्त हो चुकी है।
भीखमपुर निवासी अजीत यादव का कहना है कि जबसे तेज़ापुर शौचालय बना है, तब से ही इसकी हालत खराब है। यहां न तो साफ-सफाई होती है और न ही कोई देखरेख करने वाला आता है। स्थानीय निवासी जमुना सिंह ने आरोप लगाया कि सरकारी धन का दुरुपयोग हो रहा है। शौचालय कभी चालू ही नहीं रहता। दरवाजे टूटे हैं, पानी नहीं है और गंदगी का अंबार लगा रहता है, जिससे लोग इसका इस्तेमाल ही नहीं करते।
खालिसपुर सामुदायिक शौचालय में ताला लगा है जहां गंदगी का अंबार है महिला शौचालय का दरवाजा खुला था जिसकी सीटे पूरी तरह से टूट चुकी है। शौचालय में काफी गंदगी है। बगल ही लगा हैंडपंप काफी दिनों से खराब है कभी साफ सफाई नहीं की जाती तथा सामुदायिक शौचालय कभी खुला ही नहीं रहता। यहां की प्रधान संयोगिता देवी है। सिकंदरपुर में बना शौचालय एवं स्नानागार पूरी तरह से बंद है जहां गंदगी का अंबार लगा है। प्रधान सुनील ने बताया कि बगल ही मजार होने की वजह से यहां कोई नहीं जाता तो सवाल यह उठता है कि मजार पहले बनी थी या शौचालय ? अगर मजार पहले बनी थी तो बगल ही शौचालय बनाने की क्या जरूरत थी जहां लाखों रुपए खर्च किए गए।
इस मामले में खंड विकास अधिकारी आलोक कुमार ने कहा कि मामले की जानकारी मिली है। जांच कराकर शौचालय की स्थिति सुधारने के निर्देश दिए जाएंगे। गंदगी और लापरवाही के लिए जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
बड़ा सवाल यह है कि जब शौचालय उपयोग में ही नहीं हैं, तो हर महीने रखरखाव के नाम पर हो रहा भुगतान आखिर किसके लिए? ओडीएफ के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच का यह अंतर प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है।
रिपोर्ट-आशीष निषाद

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