फूलपुर आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। आधुनिकता के दौर में त्योहार मनाने के तौर-तरीकों में भी बड़ा बदलाव आया है। कभी कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व गांव-गांव के घरों, मंदिरों के साथ ही तहसील, ब्लाक और विद्युत उपकेंद्रों पर भी धूमधाम से मनाया जाता था। अब सरकारी विभागों में जन्माष्टमी मनाने की वह परंपरा लगभग समाप्त हो गई है। क्षेत्र के थाने ही आज भी इस पर्व को परंपरागत रूप से मनाने का दायित्व निभाते नजर आते हैं।
वर्षों पूर्व जन्माष्टमी के अवसर पर गांवों और नगर के मंदिरों में कई दिन पहले से ही साफ-सफाई, रंगाई-पुताई शुरू हो जाती थी। लाउडस्पीकर पर भक्ति गीतों की गूंज सुनाई देने लगती थी। छोटे बच्चे आकर्षक झांकियां तैयार करते थे। श्रद्धालु पूजा-पाठ के बाद नगर के विभिन्न मंदिरों, तहसील, ब्लाक और अन्य स्थानों पर पहुंचकर झांकियों के दर्शन करते थे। रात्रि 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद तहसील, ब्लाक और विद्युत उपकेंद्रों पर मौजूद महिलाएं सोहर गीत गाती थीं। इसके बाद प्रसाद वितरण होता था और श्रद्धालु अपने घरों को लौटते थे। गांवों से महिला, पुरुष और बच्चों का हुजूम इन आयोजनों में शामिल होने के लिए निकलता था। फूलपुर तहसील में तो इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे, जिसमें अधिकारी भी शामिल होते थे।
समय के साथ तहसील, ब्लाक और विद्युत केंद्रों पर जन्माष्टमी मनाने की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो गई। हालांकि थाना परिसरों में आज भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का आयोजन होता है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता, समय का अभाव या आस्था में आए बदलाव को इसकी वजह माना जाए, लेकिन इतना जरूर है कि जन्माष्टमी के पुराने दौर की वह रौनक और सामूहिक उत्सव का माहौल अब पहले जैसा दिखाई नहीं देता।
रिपोर्ट-पप्पू सिंह/मुन्ना पाण्डेय