महराजगंज आजमगढ (सृष्टिमीडिया़)। कहने को तो भारत आजादी के 75 साल पूरे कर चुका है और ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में नित नए मुकाम भी हासिल कर रहा है। जहां कुछ लोगों के सामाजिक स्तर में सुधार होते दिख रहा है तो वहीं भारत की आत्मा कहे जाने वाले किसानों की हालत बैलगाड़ी की चाल से अभी भी चल रही है। कहने को तो देश और प्रदेश की सरकारें किसानों के लिए अनेक योजनाएं संचालित कर रहे हैं। ऐसे में प्रश्न सिर्फ इस बात का उठता है कि भारत का अन्नदाता क्या उन योजनाओं का उन विशेष परिस्थितियों में लाभ उठा पा रहा है जो उनके पसीने के मूल्य को पानी में बहा ले जाती है और जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और अधिकारी उन योजनाओं की आड़ में वादों की झड़ी लगा जाते हैं जिसकी आस में किसानों के हाथ खाली ही रह जाते हैं। ऐसा ही मामला महाराजगंज ब्लॉक के देवरांचल के किसानों के साथ हो रहा है।
बता दें कि विगत बारिश के मौसम के अंतिम दिनों में आई बाढ़ ने बंधे के उत्तर के किसानों का सब कुछ बाढ़ के पानी की भेंट चढ गया। किसानों के शोर-शराबे और सामाजिक संगठनों के पैदल मार्च एवं धरने के कारण जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों का रेला लग गया और योजना के नाम पर वादों की झड़ी भी लगा दी गई परंतु बाढ़ का पानी उतरते ही जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के वादे किसानों के हाथ में रेत की तरह ही रह गयी जो समय के साथ उनके हाथों से निकलती जा रही हैं। जिससे भयभीत होकर अपने अस्तित्व के लिए किसानों ने विगत 22 दिनों से बंधे पर बाढ़ से हुए नुकसान के मुआवजे के लिए धरने पर बैठे हैं। न ही कोई जनप्रतिनिधि या अधिकारी उनके दुख दर्द को समझने के लिए अभी तक पहुंचा। ऐसे में सामाजिक संगठन बाढ़ पीड़ित संगठन एवं देवारा विकास सेवा समिति किसानों के साथ शामिल हो उनकी आवाज बनने का काम कर रहे हैं। अब देखना यह है कि किसानों की आवाज कब तक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और सरकार के कानों तक पहुंचती है।
रिपोर्ट-राजनरायन मिश्र