अहरौला आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। स्थानीय थाना क्षेत्र के शम्भूपुर गांव में पांच लोगों की मौत के बाद पूरा गांव गहरे सदमे और मातम में डूबा है। एक ओर जिस घर में परिवार की शांति और अरविंद सिंह के व्यवहार में सुधार की उम्मीद लेकर धार्मिक अनुष्ठान कराया जा रहा था, वहीं कुछ ही घंटों में वहां चीख-पुकार और मौत का ऐसा मंजर सामने आया कि पूरा परिवार बिखर गया। इस घटना में अरविंद सिंह की पत्नी बबीता सिंह, मासूम बेटे शौर्य तथा दो पुरोहितों महेंद्र पाठक और अखिलेश मिश्र की मौत हुई, जबकि पुलिस कार्रवाई के दौरान अरविंद सिंह की भी मौत हो गई। इस तरह घटनाक्रम में कुल पांच जानें चली गईं।
शम्भूपुर की यह घटना अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई है। क्या परिवार के भीतर वर्षों से जमा तनाव को समय रहते समझा जा सकता था? क्या अंधविश्वास और मानसिक तनाव के बीच उचित मदद परिवार तक पहुंच पाई? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे। फिलहाल गांव में पांच मौतों का दर्द हर चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा है।
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अनुष्ठान के तीसरे दिन हुआ खूनी घटनाक्रम
आजमगढ़। बताया जाता है कि परिवार में लंबे समय से चल रहे तनाव और अरविंद सिंह के व्यवहार को लेकर घर के लोगों में चिंता थी। परिवार की ओर से शांति और अरविंद के व्यवहार में सुधार की उम्मीद में पांच दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान कराया जा रहा था। इसमें वैदिक ब्राह्मणों को पूजा-अनुष्ठान संपन्न कराना था। इसी दौरान मंगलवार को पूजा के बीच अरविंद सिंह के पहुंचने के बाद विवाद शुरू हुआ। उपलब्ध पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पुरोहितों से पहचान संबंधी दस्तावेज मांगे जाने को लेकर विवाद बढ़ा और देखते ही देखते गोलीबारी हो गई। गोलीबारी में अरविंद की पत्नी बबिता तथा पूजा करा रहे पुरोहित महेंद्र पाठक और अखिलेश मिश्र की मौत हो गई। अरविंद और उसके मासूम बेटे को अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई। इस तरह करीब कुछ घंटों के घटनाक्रम ने परिवार के कई सदस्यों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
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2018 से चले आ रहे विवाद का दर्दनाक अंत
आजमगढ़। ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 2018 में परिवार में हुए विवाद और सुनील सिंह की हत्या के बाद से ही परिवार सामान्य स्थिति में नहीं लौट सका था। लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन यह विवाद इतनी भयावह त्रासदी में बदल जाएगा। एक हंसता-खेलता परिवार देखते ही देखते मौत और मातम के साये में आ गया। परिवार की खुशियों की जगह अब उन लोगों की यादें हैं, जो एक ही घटनाक्रम में हमेशा के लिए बिछड़ गए।
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भरे-पूरे परिवार में अब बचीं महिलाएं और बच्चियां
आजमगढ़। अरविंद सिंह और उसके भाई सुनील सिंह का परिवार कभी भरा-पूरा हुआ करता था। परिवार में माता, भाई, बच्चे और अन्य सदस्य मिलाकर करीब 12 लोग थे। इस घटनाक्रम के बाद परिवार की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। अब परिवार में मुख्य रूप से महिलाएं और बच्चियां ही बची हैं। इस घटना ने न सिर्फ एक परिवार को तोड़ा, बल्कि दो पुरोहित परिवारों के सिर से भी अभिभावक का साया छीन लिया है। पुरोहित महेंद्र पाठक और अखिलेश मिश्र के घरों में भी मातम पसरा है। उनके परिजनों और बच्चों के लिए यह घटना जिंदगी भर का दर्द छोड़ गई है।
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दिल्ली से गांव पहुंचा स्व.सुनील सिंह का परिवार
आजमगढ़। घटना के बाद गुरूवार को स्व.सुनील सिंह की पत्नी ममता सिंह अपनी दोनों बेटियों ऋतु और कशिश के साथ दिल्ली से शम्भूपुर गांव पहुंचीं। बताया जाता है कि सुनील सिंह की हत्या के बाद उनकी पत्नी अपनी दोनों बेटियों को लेकर दिल्ली चली गई थीं, जबकि परिवार की अन्य बेटियां गांव में रह रही थीं। वर्तमान घटनाक्रम के दौरान गांव में मौजूद कुछ बच्चियां भी घायलों के साथ आजमगढ़ चली गई थीं। परिवार में पुरुष सदस्यों की अनुपस्थिति के कारण अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी भी परिवार की बेटियों को निभानी पड़ी।
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भतीजी ने दी मुखाग्नि, गांव में पसरा सन्नाटा
आजमगढ़। घर पर दाह-संस्कार कराने वाला कोई पुरुष सदस्य नहीं बचने की स्थिति में शौर्य सिंह, बबिता सिंह और अरविंद सिंह का अंतिम संस्कार आजमगढ़ के रामघाट पर किया गया। बताया गया कि स्व.सुनील सिंह की बेटी वर्षा ने अंतिम संस्कार में मुखाग्नि दी। अब परिवार के लोग आजमगढ़ से वापस शम्भूपुर गांव लौट रहे हैं। जिस घर में कभी परिवार की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब मातम और सन्नाटा है।
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पापा ने भाई को मारी थी गोली
आजमगढ़। घटना के बाद अरविन्द सिंह की बेटी का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें उसने कहा है कि पापा ने ही भाई शौर्य सिंह को गोली मारी थी जिससे वह घायल हो गया और अस्पताल में मौत हो गयी।
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कड़ी सुरक्षा के बीच किया गया पांचों शवों का अंतिम संस्कार
आजमगढ़। शंभूपुर गहजी में अरविन्द सिंह के घर हुई घटना में मृत पांचों शवों का अलग-अलग जगहों पर कड़ी सुरक्षा के बीच अंतिम संस्कार किया गया। अरविन्द सिंह, बबिता सिंह व शौर्य सिंह का अंतिम संस्कार आजमगढ़ के रामघाट पर किया गया।
रिपोर्ट-संतोष चौबे