अतरौलिया आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना को लेकर क्षेत्र में ललही छठ का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। इस अवसर पर ग्रामीण महिलाएं एक स्थान पर एकत्रित हुईं और सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना कर ललही छठ की कथा सुनी।
ग्रामीण मान्यता के अनुसार ललही छठ का व्रत माताएं अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए रखती हैं। इसे हलषष्ठी और हरछठ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान बलराम की पूजा करने से संतान पर संकट नहीं आता और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। खेती-किसानी से जुड़े इस पर्व में हल और कृषि उपज का भी विशेष महत्व माना जाता है। व्रत के दिन महिलाएं सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और दिनभर व्रत रखती हैं। पूजा के लिए मिट्टी या गोबर से चौका बनाकर उसमें तालाब का प्रतीक तैयार किया जाता है। इसमें कुशा तथा विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां लगाकर भगवान बलराम और ललही छठ माता का पूजन किया जाता है। पूजा में सात प्रकार के अनाज, फल-फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के बाद महिलाएं सामूहिक रूप से ललही छठ की कथा सुनती हैं। कथा के दौरान संतान की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है। परंपरा के अनुसार व्रती महिलाएं हल से जोती गई जमीन से पैदा हुए अनाज का सेवन नहीं करतीं। कई महिलाएं इस दिन केवल व्रत में मान्य प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का ही सेवन करती हैं।
क्षेत्र में ग्रामीण अंचल की महिलाओं के सामूहिक रूप से कथा और पूजन करने से पर्व का माहौल भक्तिमय बना रहा। इस दौरान महिलाओं ने एक-दूसरे के साथ पर्व की परंपराएं साझा कीं। ललही छठ का यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ ग्रामीण लोक संस्कृति, मातृत्व और आपसी मेल-जोल की परंपरा को भी मजबूत करता है।
रिपोर्ट-आशीष निषाद