आस्था का अनूठा केंद्र है चंद्रमा ऋषि आश्रम

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आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। पूर्वांचल की धरती आजमगढ़ को यूं ही ऋषियों और तपस्वियों की भूमि नहीं कहा जाता, इस पावन धरती पर अनेक ऐसे धार्मिक और पौराणिक स्थल हैं, जिनसे जुड़ी मान्यताएं आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं। इन्हीं में से एक है कंधरापुर थाना क्षेत्र में आजमगढ़-किशुनदासपुर मार्ग के समीप तमसा और सिलनी नदी के पावन संगम तट पर स्थित चंद्रमा ऋषि आश्रम। दो नदियों के संगम पर स्थित यह स्थल धार्मिक आस्था, पौराणिक कथा और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। जिला प्रशासन की वेबसाइट भी चंद्रमा ऋषि आश्रम को तमसा एवं सिलनी नदी के संगम पर स्थित धार्मिक स्थल के रूप में दर्ज करती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा ऋषि कोई सामान्य ऋषि नहीं, बल्कि महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र माने जाते हैं। धार्मिक परंपरा में चंद्रमा ऋषि को ब्रह्मा के अवतार से जोड़ा गया है। मान्यता है कि माता अनुसूया के तीन पुत्रों में चंद्रमा, दत्तात्रेय और दुर्वासा ऋषि का विशेष स्थान है। इन्हें क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अंश अथवा अवतार के रूप में माना जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार माता अनुसूया की पतिव्रता शक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उन्हें वरदान दिया था। इसी धार्मिक परंपरा से जुड़ी मान्यता में आगे चलकर माता अनुसूया के यहां तीन दिव्य पुत्रों के रूप में चंद्रमा, दत्तात्रेय और दुर्वासा का प्राकट्य हुआ। आजमगढ़ की धरती पर इन तीनों ऋषियों की तपस्थलियां अलग-अलग स्थानों पर आस्था का केंद्र बनी हुई हैं।
चंद्रमा ऋषि आश्रम की सबसे बड़ी विशेषता इसका तमसा और सिलनी नदियों के संगम तट पर होना है। दो नदियों के मिलन का यह स्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां नदी का शांत प्रवाह, हरियाली और आश्रम का आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
स्थानीय मान्यता है कि इसी पवित्र तट पर चंद्रमा ऋषि ने तपस्या की थी। यही कारण है कि कालांतर में यह स्थान चंद्रमा ऋषि की तपोभूमि और आश्रम के रूप में प्रसिद्ध हुआ। आज भी श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और संगम तट पर धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
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कार्तिक पूर्णिमा पर लगता है विशेष मेला
पटवध (आजमगढ़)। चंद्रमा ऋषि आश्रम पर वर्षभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन रामनवमी और कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां विशेष धार्मिक आयोजन और मेले का आयोजन होता है। इन अवसरों पर आसपास के गांवों के अलावा दूसरे जनपदों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। जिला प्रशासन भी इन दोनों अवसरों पर यहां मेला लगने की जानकारी देता है।
कार्तिक पूर्णिमा जैसे पर्व पर श्रद्धालु संगम में स्नान, पूजन-अर्चन और दान-पुण्य करते हैं। आस्था के साथ लोग अपने परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं। चंद्रमा ऋषि आश्रम केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आजमगढ़ के पर्यटन मानचित्र पर भी अपनी अलग पहचान बना रहा है। यहां पर्यटकों और श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ाने तथा पर्यटन विकास के लिए कार्य कराए गए हैं। हाल के वर्षों में आश्रम और संगम क्षेत्र के विकास की दिशा में प्रशासनिक स्तर पर भी प्रयास हुए हैं।
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पौराणिक जड़ों से जोड़ता है आश्रम
पटवध (आजमगढ़)। तमसा और सिलनी नदी की स्वच्छता को लेकर भी अभियान चलाए गए हैं। आश्रम के आसपास दोनों नदियों से गाद निकालने और सफाई का कार्य कराया गया है, जिससे संगम क्षेत्र को और बेहतर बनाने का प्रयास किया गया। आज जब आधुनिकता के दौर में कई पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे पीछे छूट रही हैं, वहीं चंद्रमा ऋषि आश्रम आज भी लोगों को अपनी पौराणिक जड़ों से जोड़ रहा है। यहां पहुंचने वाला व्यक्ति केवल मंदिर या आश्रम में दर्शन नहीं करता, बल्कि दो नदियों के संगम, ऋषि परंपरा और लोक आस्था की उस विरासत को महसूस करता है, जिसकी स्मृतियां पीढ़ियों से चली आ रही हैं। तमसा और सिलनी का संगम, शांत वातावरण और चंद्रमा ऋषि की तपोभूमि, इन तीनों का मेल इस स्थान को आजमगढ़ की धार्मिक विरासत में विशेष स्थान देता है।
रिपोर्ट-बबलू राय

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