रमजान में एक अहम इबादत एतेकाफ भी है: मो.अब्दुल बारी

शेयर करे

अतरौलिया आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। रमजान उल मुबारक की मुकद्दस तारीन इबादतों में से एक अहम इबादत एतेकाफ भी है, जो रमजान उल मुबारक के आखिरी 10 दिनों में अंजाम दी जाती है। इसका विस्तार के साथ कुरान और हदीस में जिक्र आया है। एतेकाफ अल्लाह ताला से करीब होने और अंदरुनी नफसानी ख्वाहिश को कंट्रोल करने का बेहतरीन जरिया है। उक्त बातें मौलाना मोहम्मद अब्दुल बारी नईमी आजमी पेश इमाम जामा मस्जिद अतरौलिया एवं उस्ताद मदरसा अरबिया फैज ए नईमी सरैया पहाड़ी ने कही।
उन्होंने कहा कि एतेकाफ करने का मतलब ठहरना और धरना देने से है और मस्जिद में अल्लाह के लिए अच्छी नियत के साथ ठहरना एतेकाफ है। एतेकाफ का मकसद दुनिया और उसके झमेलों से अलग होकर अल्लाह के साथ अपना रिश्ता मजबूत और पुख्ता करना है। अपनी तमाम तरह की मसरूफिय से अलग होकर अल्लाह के जिक्र के साथ मशगूल हो जाए। अल्लाह की मोहब्बत दिल में जबान में इस तरह समा जाए कि दुनिया के साथ मोहब्बत और चाहत कम हो जाए। यही मोहब्बत और उल्फत कब्र की अंधेरी कोठरी में काम आएगी। एतेकाफ करने वाले व्यक्ति की मिसाल उस व्यक्ति की तरह है जो किसी मलिक की दर पर जा पड़े और जब तक उसकी दरखास्त को स्वीकार न की जाए वहां से वापस होने का नाम न ले।
पैगंबर इस्लाम हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो ताला अलैहे वसल्लम रमजान उल मुबारक के आखिरी अशरह का एतेकाफ किया करते थे। अगर किसी वजह से छूट जाता तो ईद बाद उसको पूरा करते थे। इसके लिए आकिल-बालिग मुसलमान मर्द और औरत का हैज और नेफास से पाक होना शर्त है। वह लोग खुशकिस्मत हैं जो अपनी मस्जिदों में एतेकाफ में बैठे हुए हैं। इसके जरिए अल्लाह ताला पूरे मोहल्ले वालों पर अपनी रहमत और बरकत नाजिल फरमाता है। अगर कोई शख्स नहीं बैठा तो मोहल्ले के सारे लोग पापी और गुनहगार। कहलाते हैं।
रिपोर्ट-आशीष निषाद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *