मार्टिनगंज आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। धान की फसल में जिंक की कमी के कारण रोग ग्रस्त होने की संभावना ज्यादा रहती है जिसके कारण खैरा रोग जैसी बीमारियां लगने लगती हैं। किसानों को अच्छा उत्पादन करने के लिए इनकी रोकथाम करना अति आवश्यक होता है। सहायक विकास अधिकारी कृषि मार्टिनगंज राघवेंद्र राय ने बताया कि धान की फसल में जिंक की कमी हुई तो पत्ती पीली लगने लगती है और अधिक जिंक की कमी से पत्ते पर भूरे रंग के धब्बे होने लगते हैं।
उन्होंने बताया कि इसकी कमी से धान का विकास प्रभावित होता है बल्कि धान का विकास रुक जाता है। पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं बालियां निकलने में देरी होती है। इसलिए धान की फसल में 45 किलो यूरिया के साथ 5 किलो जिंक सल्फेट और 4 किलो फेरस सल्फेट डालना अति आवश्यक होता है। उन्होंने बताया कि जिंक की कमी होने के कारण किसी प्रकार के लक्षण दिखाई देने लगे तो एक किलो जिंक सल्फेट और 5 किलो यूरिया को 200 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। इसके बाद धान का विकास होने लगे तो 2 किलो जिंक सल्फेट का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। ऐसा करने से धान में विकास अधिक होता है और धान की रोक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
रिपोर्ट-अद्याप्रसाद तिवारी