मार्टिनगंज आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। नवरात्र प्रारंभ हो रहा है नवरात्र शब्द से विशेष रात्रियों का बोध होता है। इस समय शक्ति के 9 स्वरूपों की उपासना की जाती है। रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक है। भारत के प्राचीन ऋषि मुनियों ने रात को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है इसलिए दीपावली होलिका शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सव को रात में ही मनाने की परंपरा है।
पंडित गिरिजा प्रसाद पाठक माता अठरहि धाम के पुजारी महुजा ने बताया कि नवरात्र की शक्ति में 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है। जो उपासक इन शक्तिपीठों में नहीं पहुंच पाते वे अपने निवास स्थान पर ही शक्ति का आवाहन करते हैं। आजकल अधिकतर उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न कर देते हैं। सामान्य भक्त ही नहीं पंडित और साधु महात्मा भी नवरात्र में पूरी रात जागना नहीं चाहते और न ही कोई आलस्य से जागना चाहता है। बहुत कम उपासक आलस्य त्याग कर आत्म शक्ति मानसिक शक्ति और योग शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं। उन्होंने बताया कि रात में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है। हमारे ऋषि मुनि आज से कितने ही हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके हैं। हमारी चेतना के अंदर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण तीनों प्रकार के गुण व्याप्त हैं। प्रकृति के साथ किसी चेतना के उत्सव को नवरात्र कहते हैं। पहले 9 दिनों में 3 दिन तमोगुण प्रकृति की आराधना करते हैं। दूसरे तीन दिन रजोगुणी और आखिरी तीन दिन सतोगुण की आराधना का विधान है।
रिपोर्ट-अद्याप्रसाद तिवारी