अहंकार का समाप्त होना ज्ञान है: विशाल भारत

शेयर करे

लालगंज आजमगढ (सृष्टिमीडिया)। स्थानीय विकास खंड के मईखरगपुर गांव स्थित आत्म अनुसंधान आश्रम परिसर के जया विजया सभागार मे आदि गुरु दत्तात्रेय की जयन्ती पर एक गोष्ठी आयोजित की गयी ।
जयन्ती पर आयोजित गोष्ठी मे शिष्यों व श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए परमपूज्य बाबा विशाल भारत ने अपने आर्शीवचन मे कहा कि संपूर्ण सौर मंडल में मेरे प्रणाम के अधिकारी उन सब को भी प्रणाम करता हूं। जो मैं जानता हूं जब दत्तात्रेय रूपी पंचभूत शरीर में थे तो उन्होंने किसी को शिष्य नहीं बनाया। हाड मांस के अब तक सृष्टि में सबसे बड़ा कोई अवधूत पैदा हुआ तो वह दत्तात्रेय। उन्होंने जिससे सीखा उसे गुरु बना लिया। उन्होंने कुल 24 लोगों को गुरु बनाया था। यह अलग बात है कि चाहे वह परशुराम रहे हो, चाहे जनक रहे हो। परशुराम कहे कि मैं गुरुओं के गुरु आदि गुरु दत्तात्रेय का शिष्य हूं। लोगों ने कहा कि मेरे गुरु दत्तात्रेय है । दत्तात्रेय ने कभी नहीं कहा कि मैंने शिष्य बनाया। उस महातत्व जिनका आज दिन है। वह हमेशा सीखने की बात किये सिखाने की बात नहीं किये। आश्रम परिसर में कोई भी सीखने नहीं आया। आलोचना की दृष्टि से नहीं परन्तु हमारी वेदना जरूर है। आज से ही संकल्प करें कि मैं सीखूगा। आज का जयन्ती मनाना दिन सार्थक हो जाएगा। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि विशाल रूपी पंचभूत शरीर से सीखे, परिवेश से सीखें, पौधों, कुंड, दीपक, परिवार, पर्यावरण से सीखें। सीखना चाहते तो हाड मांस का शरीर जब गर्भ में पड़ जाता है तभी से सीखता है। गर्भ से बाहर आ जाता है बोलता नहीं है आंखें बराबर क्रियाशील रहती हैं वह आंखों से सीखता है। अहंकार का समाप्त होना ज्ञान है। आप ज्ञानी बनकर नहीं सीख सकते , ज्ञानी बनना है तो अहंकार रहित व अज्ञानी बने। ऊं का अर्थ है दत्तात्रेय, जगत की सृष्टि , जगत का पालन व जगत का संहार करने वाला। सनातन का कोई ऐसा मंत्र नहीं है जिसमें ऊं न लगता हो अपवाद को छोड़कर। काशी के आनंद कानंद का तपोवन जो सरयू तट तक जाता है। जिसमे योगेश्वर निवास करते है द्यतपोवन में जन्म लेने वालों को ग्लानी नहीं, गौरवान्वित होने की आवश्यकता है, समय काल का प्रभाव पड़ता है। वर्तमान में देख रहा हूं सबसे ज्यादा अपमानित, तिरस्कृत व प्रताड़ित मानव जाति के द्वारा भगवती महालक्ष्मी, भगवती अन्नपूर्णा का हो रहा है। सर्वाधिक जिसके पास जितना ज्यादा धन है धन का नंगा प्रदर्शन कर रहा है मैं देख रहा हूं जो भी कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं इसमें दूसरों को झूठ मुठ का दोष देते हैं। विडंबना यह है कि जो धनी है वह तो अपमानित कर ही रहे हैं जो निर्धन है ऋण लेकर जितना बन रहा है वह भी अपमानित कर रहे हैं। यह कार्यक्रम में त्रिमूर्ति के लिए कर रहा हूं उनको सहभागी बनना है वह तय करें । कार्यक्रम में कभी दत्तात्रेय के लिए करता हूं कभी महाशिव के लिए शिवरात्रि मनाता हूं जो भी कार्यक्रम करता हूं मेरा लक्ष्य जिसके लिए कर रहा हूं वह रहता है। मैं जानबूझकर सुना रहा हूं लेकिन इस उम्मीद से नहीं सुनाते हैं कि कोई समझ लेगा मुझे तनिक भी आशा नहीं है लेकिन जब तक सांस चल रही है। समाज में पुरुषार्थ करना मेरी विवशता है। संख्या बल मेरे जीवन में कभी माने नहीं रखता। भविष्य में भी नहीं रखेगा। मुझे यहां रहते हुए 28 वर्ष बीत गया आश्रम आने वाला कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि मैं 20 वर्षों से आश्रम आ रहा हूं आश्रम से यह सीख लिया हूं। समय काल ऐसा आ गया है कि अपने माता-पिता के यहां जाने के लिए लोग तैयार नहीं हैं। मैं तो गैर व्यक्ति हूं दुनिया के अधिकांश घरों की यह स्थिति है। लाभ हानि किसको कहते हैं अच्छे-अच्छे व्यक्तियों व विद्वान लोगों से पूछ दिया जाए लाभ हानि किसे कहते हैं। पैसा, प्रतिष्ठा, कुर्सी वर्तमान परिवेश मे मनुष्य की इतनी लाभ हानि है । व्यक्ति अपना दायरा इतना न्यूनतम कर चुका है। उसे पता भी नहीं, समझने के लिए तैयार नहीं जानता बहुत कुछ है पता कुछ नहीं है। कल्याण के लिए भारत भूमि पर बहुत सी दुकानें खुली हैं उन दुकानों पर जाना चाहिए। भारत भूमि पर दुकानों की कमी नहीं है । धर्म , अध्यात्म या ईश्वर तो व्यापार हो गया है। आर्शीवचन कार्यक्रम देर रात्रि तक चला। जिसके बाद सभी श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
रिपोर्ट-मकसूद अहमद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *