राम की बरात में महिलाएं भी हुईं शामिल, मंगल गीतों की गूंज

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आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। आसपास के लोगों में विवाह का निमंत्रण बांटा गया, तो बरात में जाने को हर कोई तैयार भी हो गया। खास बात यह आज के दौर के हिसाब से बरात में महिलाओं की संख्या भी ज्यादा रही। अतलस पोखरा से निकली राम बरात को बदरका, कटरा, पुरानी सब्जीमंडी, जामा मस्जिद, पांडेय बाजार, ब्रह्मस्थान होते हुए राजघाट पहुंचना था, लेकिन कटरा सराय के पास विद्युत पोल बदलने के कारण रास्ता बाधित हो गया। ऐसे में बरात को बदरका तिराहे से ही पांडेय बाजार की ओर मोड़ दिया गया। रथ पर भगवान राम की तस्वीर तो उसके आगे महिलाओं का समूह मंगल गीत गाते हुए आगे बढ़ रहा था। सबसे आगे दशरथ और राजा जनक की भूमिका निभाने वाले जयमंगल दास और गोपाल वर्मा चल रहे थे।
विभिन्न रास्तों से होते हुए बारात तमसा किनारे राजघाट पहुंची जहां मंडप प्रवेश और हल्दी की रस्म के साथ महिलाओं ने राम का परछन किया। उसके बाद अखंड रामायण पाठ का आरंभ किया गया। हल्दी के दौरान रस्म से जुड़े गीतों ने माहौल को उत्साहपूर्ण बना दिया। हालांकि कुछ साल पहले तक राम जी की प्रतिमा को बारात में शामिल किया जाता रहा है, लेकिन प्रतिमा को मंदिर में स्थापित करने के बाद से बारात तक तस्वीर को ही रथ पर रखा जाने लगा।
शहर से सटे राजघाट श्मशान पर हर बार की तरह इस बार भी मंगलवार को श्रीराम के साथ जानकी का विवाह संपन्न होगा और मेले का आयोजन किया जाएगा। राम विवाह के उपलक्ष्य में रविवार की शाम अखंड रामायण पाठ शुरू किया गया। सोमवार को समापन के बाद हवन और उसके बाद भतवान की रस्म पूरी की जाएगी। राम विवाह को लेकर आसपास के गांवों में उत्साह का माहौल दिखा। महिलाओं में मंगल गीत गाने को लेकर उत्साह था। शहर से सटे राजघाट श्मशान पर सैकड़ों वर्षों से श्रीराम-जानकी विवाहोत्सव के साथ मेले का आयोजन किया जाता है। मेले की खासियत यह कि यहां कृष्ण और बलदाऊ की बाल रूप की प्रतिमाओं की बिक्री होती है। मेले में पहुंचने वाले तमसा नदी में स्नान के बाद संतों की समाधि पर कच्ची खिचड़ी चढ़ाते हैं और दर्शन-पूजन के बाद मेले का आनंद लेते हैं। शहर व आसपास के लोगों की मान्यता है कि कृष्ण और बलदाऊ की प्रतिमा को साल भर घर में रखकर पूजा करने से सुख-समृद्धि मिलती है।
राजघाट कुटी के महंत ने बताया कि यहां के पहले महंत बाबा कबीर दास थे, जिनकी समाधि पर लोग कच्ची खिचड़ी चढ़ाते हैं और प्रसाद स्वरूप वही कच्ची खिचड़ी घर ले जाकर भंडार मेें रखने से कभी अन्न की कमी नहीं होती। यहां के मेले के बाद से ही गोविद साहब का मेला शुरू होता है।
रिपोर्ट-सुबास लाल

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