फूलपुर आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। होली का महत्वपूर्ण पर्व आज के आधुनिकता के इस दौर में बहुत बदल गया है। सौहार्द्र आपसी भाईचारा की जगह अश्लीलता और फूहड़पन ने ले लिया है।
होली पर्व की तैयारी बंसत पंचमी के दिन से शुरू हो जाता था जिसमें विधि विधान से रेड़ का पेड़ गड्ढा खोदकर लगाया जाता था और उसी दिन से ग्रामीण उपला गन्ने की पत्ती रखना शुरू कर देते थे। प्रत्तिदिन ग्रामीण होलिका के स्थान पर एकत्रित होते थे और गीत संगीत और जोगीरा बोलते थे। पत्रा के हिसाब से होलिका दहन में अग्नि बुजुर्ग लगाते थे। उससे पहले सुबह से घर के हर सदस्य को उपटन लगाकर जो मैल निकलती थी उसको होलिका में डालते थे। होलिका दहन के साथ रंग गुलाल शुरू हो जाते थे। घर की महिलाएं गोझिया नमकीन अन्य प्रकार के खाने पीने का सामान बनाकर रखती थी। सभी लोग होली खेलने प्रत्येक घरों में जाते थे। सामान्य वर्ग के बच्चे दलित अनसूचित मुहल्ले बनवासी मुहल्ले में दर्जनों की सख्या में बाल्टी में रंग और बॉस की पिचकारी लेकर निकलते थे। बाल्टी में एक, दो या पांच रुपये रंग के लिए देती थी, ये प्यार था।
आज के समय में होलिका दहन के दिन फारमल्टी होती है। लकड़ी रखी गत्ता पालथिन से होलिका दहन हो जाता है। गावो में तो गनीमत है नगर में मात्र कुंतल चार कुंतल लकड़ी रख कर प्रथा निभाई जाती है। शराब का सेवन अत्यधिक होने लगा है। रेडीमेट सामग्री बिकने लगी है। मिलावट वाला खोवा मिलावटी मिठाई धड़ल्ले से बिक रही है। पूर्वजो के व्यंजन शुद्धता की मिशाल थे।
रिपोर्ट-पप्पू सिंह/मुन्ना पाण्डेय