आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। सनातन परंपरा में साल भर तमाम व्रत व त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन सावन का महत्व अन्य महीनों से काफी अलग है। आम तौर पर इस महीने में शिव की आराधना की जाती है, लेकिन इसके साथ ही हम कई अन्य देवी-देवताओं की भी आराधना करते हैं।
आपसी रिश्तों के अलावा प्रकृति, देव के साथ जहरीले जंतुओं से भी नाता जोड़ते हैं। इस नाते सावन को शिव तक ही सीमित नहीं माना जा सकता। सावन माह शुरू होते ही हर तरफ खेतों में हरियाली हमें प्राकृतिक सौंदर्य का अहसास कराती हैं, तो वहीं धान की रोपाई के दौरान आज भी गांवों में महिलाएं कजली गाती हैं। सिवान में गूंजने वाली कजली के स्वर हमें सामूहिकता प्रदान करती हैं। पहले ही दिन से हम शिव का अभिषेक करते हैं, तो वहीं पंचमी के दिन शिव के गले का हार मानकर नागदेव की पूजा करते हैं। माना जाता है कि शेषनाग के फन पर पृथ्वी टिकी है इसलिए उनके अंश के रूप में नाग की पूजा के बहाने पाताल में निवास करने वालों से भी हमारा नाता जुड़ जाता है। नाग पंचमी के दिन पडऩे वाले झूले पर सभी भेदभाव मिट जाते हैं, क्योंकि सभी एक साथ झूलने के साथ कजली का स्वर भी मिलाते हैं। दूर रहने वाले पति-पत्नी जहां एक-दूसरे के करीब रहना चाहते हैं वहीं पूर्णिमा के दिन हर भाई-बहन एक-दूसरे का स्नेह पाने को आतुर रहते हैं। इसी महीने में हम देवी के नाम पर नीम की पूजा के बहाने पर्यावरण संरक्षण भी करते हैं। एक तरफ देवी को धार अर्पण तो दूसरी ओर ग्राम देवता के रूप में डीह, काली और सम्मो माता की पूजा की जाती है। सबके साथ इस माह में भी हनुमानजी नहीं भूलते। यानी सावन के चौथे मंगलवार को हम हनुमान जी को रोट यानी आटा, चीनी और दूध मिश्रित पकवान के साथ तुलसी दल अर्पित करते हैं। माना जाता है कि हनुमान जी का सभी देवी-देवताओं से नाता है और उनकी पूजा से संकटों का निवारण हो जाता है। इस प्रकार देखा जाए तो सामाजिक रिश्तों के अलावा आकाश, पाताल और पृथ्वी पर विराजमान देवी-देवताओं की पूजा एक ही माह में करके हम सबसे जुड़ जाते हैं। मेरा मानना है कि सावन शिव आराधना के लिए विशेष तो है, लेकिन शिव तक सीमित नहीं कहा जा सकता।
-गिरिजा शंकर पाठक, पुजारी, माता अठरही धाम।
रिपोर्ट-प्रमोद यादव