फलाहार के साथ मां को अर्पित किया जाता है पूरा आहार

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आजमगढ़ (सृष्टिमीडिया)। दुर्गा पूजा को लेकर हर तरफ तैयारियां तेज हो गई हैं, लेकिन शहर से सटा एक स्थान ऐसा है जहां पहुंचने के बाद आम आदमी की जिज्ञासा बढ़ जाती है यह जानने के लिए कि आखिर यह कौन सी परंपरा है। हम बात कर रहे हैं बंग सोसायटी के चार दिवसीय दुर्गा पूजा समारोह की। यहां माता रानी को भोग लगाने की परंपरा सबसे निराली है।
आमतौर पर नवरात्र में मां को फलाहार का भोग लगाया जाता है, लेकिन यहां प्रतिमा स्थापना के दूसरे दिन यानी सप्तमी से मां को पूरा भोजन अर्पित किया जाता है। इसमें चार किस्म की दाल मिश्रित खिचड़ी के साथ कोहड़ा-चना और आलू की सब्जी होती है। साथ में टमाटर की चटनी और पापड़ भी अर्पित किया जाता है। मां को भोग अर्पित करने के बाद सभी लोग उसी को प्रसाद स्वरूप साथ में ग्रहण करते हैं। शहर में बंग समाज के लगभग 15 परिवार के लोग रहते हैं और सप्तमी से लेकर नवमी तक पूजा स्थल पर ही एक साथ जमीन पर बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं। इसमें न कोई छोटा होता है और न ही कोई बड़ा। भोजन के बाद अपना पत्तल लोग स्वयं फेंकते हैं। माता को अर्पित होने वाले शाम के भोग में फलाहार संग हलवा-पूरी चढ़ता है। यानी दिन का भोजन सभी लोग माता जी के साथ करते हैं और रात को हलवा-पूरी और फल का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
सोसायटी के सदस्य उत्तम कुमार दत्ता बताते हैं कि मां की ही कृपा से हमें तरह-तरह के व्यंजन मिलते हैं तो फिर उन्हें केवल फल का भोग क्यों लगाया जाए। उधर सुबह-शाम की पूजा और आरती के दौरान सभी लोग समय से पहुंच जाते हैं और जयकारा के बीच धुनोची डांस करते हैं। पूजा के लिए पुरोहित और ढाकी (विशेष वाद्य यंत्र) बजाने वाले कलाकारों को पश्चिम बंगाल से बुलाया जाता है। इस बार बांकुड़ा जिले से ढाकी बजाने के लिए दो सदस्यीय टीम षष्ठी को आएगी, जो विजया दशमी तक रहेगी। आरती के साथ भक्त शंख, घंटी बजाते हैं।
वर्ष 1956 से इस पूजा की शुरुआत हरिऔध कला भवन से हुई, लेकिन 2016 में उस भवन के ध्वस्त होने के बाद बीते नौ वर्षों से इसका आयोजन जाफरपुर में हो रहा है। उत्तम कुमार दत्ता ने बताया कि इस बार 28 सितंबर षष्ठी की शाम को प्रतिमा की स्थापना बेल के पेड़ के पास की जाएगी और उसी समय से पूजा और आरती का क्रम शुरू हो जाएगी। सप्तमी यानी 29 सितंबर से नवमी यानी एक अक्टूबर तक सुबह खिचड़ी और शाम को हलवा पूरी का प्रसाद सभी लोग समारोह स्थल पर ग्रहण करेंगे। विजयादशमी यानी दो अक्टूबर को अपराह्न लगभग 3 बजे तमसा नदी के हथिया तट के पास प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा।
रिपोर्ट-सुबास लाल

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